उस मुल्क़ के बादशाह ने बहुत ही चतुराई से शतरंज की बिसात बिछाई थी

उस मुल्क़ के बादशाह ने बहुत ही चतुराई से शतरंज की बिसात बिछाई थी। इसे मुल्क़ का नसीब कहें या बदनसीबी कि एक अखबारनवीस ने समय से पहले ही उस बिछी-बिछाई बिसात को उलट दिया। 


तो जनाब किस्सा-कोताह यूं है कि बादशाह ने मुल्क़ के एक सूबे में इस बरस के करीब आखीर में होने वाली रायशुमारी को अपने पक्ष में करने के लिए गत मई माह में पड़ोसी दुश्मन देश से लगती हुई सीमाओं पर मुल्क़ के पहरेदारों की उस टोली को रखवाली के लिए बैठा दिया जिसमें 'उस सूबे' से आने वाले युवा पहरेदारों की बहुतायत थी। 


यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि जब मई माह में पहरेदारों की टोली सीमा-रक्षा के लिए भेजी तब तक दुश्मन इस बादशाह के मुल्क़ की सीमा में बहुत अंदर तक घुसकर कब्ज़ा जमा चुका था। 


पाठकों के जेहन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बादशाह ने मुल्क़ की उस सीमा को असुरक्षित क्यों छोड़ा हुआ था? 


दुर्भाग्य से उसके मुल्क़ में गए फरवरी माह से ही एक जानलेवा महामारी पांव पसार चुकी थी जिसकी चपेट में पहरेदारों की टुकड़ियां भी आ गई थीं। 


मार्च में बर्फ पिघलने के भी दो महीने बाद पहरेदारों की टुकड़ी रवाना करने के पीछे कोई प्रयोग था या संयोग, यह तो ऊपरवाला जानता होगा।


मग़र जब पहरेदारों की टुकड़ी वहां पहुंची, तो उसने दुश्मन को अपनी सीमाओं में कई किलोमीटर अंदर तक कब्ज़ा जमाकर बैठे हुए देखा। 


बस, इसी पॉइंट पर शातिर बादशाह के दिमाग की बत्ती जल उठी और इस सारे मामले को आवाम से छिपाकर रखा गया। 


मग़र नसीबों वाले बादशाह की बदनसीबी देखिए। 


'पहरेदारी महकमे' में एक ऊंचे ओहदे पर काम कर चुके एक भूतपूर्व पहरेदार, जो अब अखबारनवीस बन चुका था, ने सीमा के अंदर घुस आए दुश्मन की खबरें मुल्क़ की आवाम के सामने पेश करना शुरू कर दिया। 


बादशाह की सिट्टी-पिट्टी गुम ! 


मग़र शातिर फ़रेबी बादशाह इन खबरों को सिरे से नकारता रहा। 


आखीर में मुल्क के पहरेदारों की उस टुकड़ी को दुश्मन के घुसपैठियों ने मार भगाया। बादशाह के कई पहरेदार शहीद हो गए। 


बादशाह की कुटिल चालों के मुताबिक़ जो काम एक सूबे में होने वाली रायशुमारी के वक़्त यानी अक्टूबर-नवंबर माह में अंजाम दिया जाना था, वे कुटिल चालें उस भूतपूर्व पहरेदार (वर्तमान में अखबारनवीस) की होशियारी व समझदारी से फेल हो गईं। 


रायशुमारी जीतने के लिए चली गई चाल का समय से पूर्व भंडाफोड़ होने से बिलबिलाए बादशाह ने कौन-सी नई चाल चली, यह जानने के लिए मेरे शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास की अगली किश्त का इंतज़ार करें। 


(साभार—साध्वी मीनू जैन) 


(उपन्यास में वर्णित सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं। किसी व्यक्ति या घटना से समानता महज एक संयोग है)


ई थी। इसे मुल्क़ का नसीब कहें या बदनसीबी कि एक अखबारनवीस ने समय से पहले ही उस बिछी-बिछाई बिसात को उलट दिया। 


तो जनाब किस्सा-कोताह यूं है कि बादशाह ने मुल्क़ के एक सूबे में इस बरस के करीब आखीर में होने वाली रायशुमारी को अपने पक्ष में करने के लिए गत मई माह में पड़ोसी दुश्मन देश से लगती हुई सीमाओं पर मुल्क़ के पहरेदारों की उस टोली को रखवाली के लिए बैठा दिया जिसमें 'उस सूबे' से आने वाले युवा पहरेदारों की बहुतायत थी। 


यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि जब मई माह में पहरेदारों की टोली सीमा-रक्षा के लिए भेजी तब तक दुश्मन इस बादशाह के मुल्क़ की सीमा में बहुत अंदर तक घुसकर कब्ज़ा जमा चुका था। 


पाठकों के जेहन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बादशाह ने मुल्क़ की उस सीमा को असुरक्षित क्यों छोड़ा हुआ था? 


दुर्भाग्य से उसके मुल्क़ में गए फरवरी माह से ही एक जानलेवा महामारी पांव पसार चुकी थी जिसकी चपेट में पहरेदारों की टुकड़ियां भी आ गई थीं। 


मार्च में बर्फ पिघलने के भी दो महीने बाद पहरेदारों की टुकड़ी रवाना करने के पीछे कोई प्रयोग था या संयोग, यह तो ऊपरवाला जानता होगा।


मग़र जब पहरेदारों की टुकड़ी वहां पहुंची, तो उसने दुश्मन को अपनी सीमाओं में कई किलोमीटर अंदर तक कब्ज़ा जमाकर बैठे हुए देखा। 


बस, इसी पॉइंट पर शातिर बादशाह के दिमाग की बत्ती जल उठी और इस सारे मामले को आवाम से छिपाकर रखा गया। 


मग़र नसीबों वाले बादशाह की बदनसीबी देखिए। 


'पहरेदारी महकमे' में एक ऊंचे ओहदे पर काम कर चुके एक भूतपूर्व पहरेदार, जो अब अखबारनवीस बन चुका था, ने सीमा के अंदर घुस आए दुश्मन की खबरें मुल्क़ की आवाम के सामने पेश करना शुरू कर दिया। 


बादशाह की सिट्टी-पिट्टी गुम ! 


मग़र शातिर फ़रेबी बादशाह इन खबरों को सिरे से नकारता रहा। 


आखीर में मुल्क के पहरेदारों की उस टुकड़ी को दुश्मन के घुसपैठियों ने मार भगाया। बादशाह के कई पहरेदार शहीद हो गए। 


बादशाह की कुटिल चालों के मुताबिक़ जो काम एक सूबे में होने वाली रायशुमारी के वक़्त यानी अक्टूबर-नवंबर माह में अंजाम दिया जाना था, वे कुटिल चालें उस भूतपूर्व पहरेदार (वर्तमान में अखबारनवीस) की होशियारी व समझदारी से फेल हो गईं। 


रायशुमारी जीतने के लिए चली गई चाल का समय से पूर्व भंडाफोड़ होने से बिलबिलाए बादशाह ने कौन-सी नई चाल चली, यह जानने के लिए मेरे शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास की अगली किश्त का इंतज़ार करें। 


(साभार—साध्वी मीनू जैन


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